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Bank of India समेत ये 4 बैंक हो सकते हैं सरकारी से प्राइवेट, जानिए क्या होगा करोड़ों ग्राहकों पर असर


'रॉयटर्स' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने जिन 4 बैंकों को शॉर्टलिस्ट किया है उनमें बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के नाम हैं

Bank of India समेत ये 4 बैंक हो सकते हैं सरकारी से प्राइवेट, जानिए क्या होगा करोड़ों ग्राहकों पर असर
इंडियन ओवरसीज बैंक

भारत सरकार ने देश के चार बैंकों को शॉर्टलिस्ट किया है जिनका प्राइवेटाइजेशन किया जा सकता है. सरकारी बैंकों को बेचकर सरकार राजस्व कमाना चाहती है ताकि उस पैसे का उपयोग सरकारी योजनाओं पर हो सके. सूत्रों ने इस बात की जानकारी दी है.

सरकार बैंकिंग सेक्टर में बड़े स्तर पर प्राइवेटाइजेशन करना चाहती है. फिलहाल बैंकिंग में सरकारी की बड़ी हिस्सेदारी है जिसमें हजारों कर्मचारी काम करते हैं. प्राइवेटाइजेशन राजनीतिक रूप से बहुत जोखिम वाला काम है क्योंकि इससे रोजगार का खतरा पैदा हो सकता है. बैंक कर्मचारियों ने इस बात की आशंका पहले ही जता दी है. भारत सरकार फिलहाल बैंकिंग सेक्टर में प्राइवेटाइजेशन टू-टायर बैंकों के साथ शुरू करना चाहती है.

क्या कहती है रिपोर्ट

‘रॉयटर्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने जिन 4 बैंकों को शॉर्टलिस्ट किया है उनमें बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के नाम हैं. इस बारे में दो अधिकारियों ने ‘रॉयटर्स’ को जानकारी दी है. हालांकि यह मामला अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है और प्राइवेटाइजेशन के कयास ही लगाए जा रहे हैं.

सूत्रों के मुताबिक 4 में 2 बैंकों का प्राइवेटाइजेशन 2021-22 के वित्तीय वर्ष में हो सकता है जो अप्रैल में शुरू होगा. सरकार फिलहाल छोटे बैंकों से कदम आगे बढ़ा सकती है क्योंकि इससे आगे के बारे में अंदाजा मिल जाएगा. सूत्रों ने यह भी बताया कि आने वाले वर्षों में बड़े बैंकों को भी बेचने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है. हालांकि स्टेट बैंक में सरकार अपनी बड़ी हिस्सेदारी रखना जारी रखेगी क्योंकि इसके जरिये देश के ग्रामीण इलाके में कई सरकारी योजनाएं चलाई जाती हैं.

IDBI बैंक का उदाहरण

बैंकिंग सेक्टर में प्राइवेटाइजेशन का काम पहले भी हो चुका है. आईडीबीआई एक सरकारी बैंक था, जो 1964 में देश में बना था. LIC ने IDBI में 21000 करोड़ रुपये का निवेश करके 51 फीसदी हिस्सेदारी ख़रीदी थी. इसके बाद LIC और सरकार ने मिलकर 9300 करोड़ रुपये IDBI बैंक को दिए थे. IDBI Bank में LIC की 51 फीसदी और सरकार की 47 फीसदी हिस्सेदारी है.

बैंकिंग एक्सपर्ट्स बताते हैं कि प्राइवेट होने पर ग्राहकों के खाते पर खास असर नहीं होता है. बैंक पहले की तरह अपनी सर्विस बरकरार रखता है. साथ ही, होम, पर्सनल और ऑटो लोन की ब्याज दरें और सुविधाएं भी पहले जैसे ही रहती हैं.

सरकारी-प्राइवेट बैंक की परिभाषा

नियमों के मुताबिक, जिस बैंक के 50% से ज्यादा शेयर सरकार के होते हैं उसे सरकारी बैंक घोषित किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए आरबीआई और अन्य रेग्युलेटर से मंजूरी लेनी होती है. प्राइवेट बैंक में 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी सरकार के पास नहीं होकर बल्कि किसी संस्था या फिर कंपनी के पास होती है. इन शेयर्स का मालिक व्यक्तिगत भी होता है और कॉर्पोरेशन भी होते हैं.

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को दो श्रेणियों में बांटा गया है- राष्ट्रीयकृत बैंक और स्टेट बैंक और उसके सहयोगी. राष्ट्रीयकृत बैंकों में बैंकिंग इकाई और कामकाज पर सरकारी नियंत्रण होता है. सरकारी और प्राइवेट बैंक की तरफ से बैंक में जमा पैसे पर दिए जाने वाले ब्याज की दर लगभग बराबर होती है. हालांकि नए बैंक जैसे बंधन बैंक, एयरटेल बैंक बाकी बैंकों की तुलना में मामूली बेहतर ब्याज दर ऑफर कर रहे हैं.

दोनों तरह के बैंक में अंतर

लोन के मामले में सरकारी बैंक की ब्याज दरें, प्राइवेट की तुलना में थोड़ी कम हैं. जैसे कि SBI ने महिला ग्राहकों के लिए कम ब्याज दरों में होम लोन का ऑफर दिया है. जिसमें 30 लाख तक के लोन पर 8.35% की ब्याद दर है. प्राइवेट बैंकों के लिए कहा जाता है कि वे बेहतर सेवा देते हैं, लेकिन वे प्रदान की गई अतिरिक्त सेवाओं के लिए चार्ज भी करते हैं. सरकारी बैंकों की फीस और चार्ज प्राइवेट की तुलना में कम होती है. बहुत सारे प्राइवेट बैंक अपनी सेवाओं का ऑफर देते रहते हैं. सरकारी बैंकों में ज्यादातर खाते सरकारी कर्मचारियों के वेतन, फिक्स डिपोजिट्स और लॉकर वगैरह के लिए खोले जाते हैं. प्राइवेट बैंकों की तुलना में उनका कस्टमर बेस बड़ा होता है.

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